क्या और कब तक…


क्या वो जो मरता है अब तक आदमी आम है,

क्यों दर-ब-दर की ठोकर खाना उसका काम है,

क्यों गुमनाम मर जाना ही उसका नाम है,

और क्यों अपना ही खून उसका आखिरी जाम है,

क्या होते थे अब तक धमाके वीरानों में,

क्यों नहीं गूंजती थी आवाज़ हुकुमती कानों में,

क्यों चुपचाप दफ़न हो जाते थे हम शमशानों में,

और क्यों वो तोल देते थे मौतों को इनामों में.

क्या हुकुमती मुँह से सिर्फ़ शहीदों को निकलती गाली है,

क्यों हमने यहाँ सब सुनने की आदत पाली है,

क्यों हमारे सीने में दिल की जगह खाली है,

और क्यों अब भी शमशीर(तलवार) अपनी काली है.

क्या अब भी न जाए आवाज़ उन कानों में,

क्यों न आज लगायें आग उनके भी बड़े मैखानों में,

क्यों न आज उतारें उनका खूँ उनके ही पैमानों में,

और क्यों न हो ऐसा जो अब तक न हुआ ज़मानों में.

क्या है वो ज़िंदगी जो हमें मुल्क से ज्यादा प्यारी है,

क्यों कम है जिनके खूँ में ज़िंदा खुमारी है,

क्यों न बतायें की हममें मुहब्बत-ऐ-मुल्क की बेशुमारी है,

और क्यों आज मुल्क को ज़रूरत हमारी है.

–-अंकित पंच

Ankit Panch

Advertisements
Comments
2 Responses to “क्या और कब तक…”
  1. palakmathur says:

    Kya baat hai!! joshilee kavita hai ekdum. maza aa gaya!

  2. This was intense!!! Sahi hai !!

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: