क्या कर पायेंगे


बार बार देखकर मंज़र तबाही के,

तबाह होना तो कम से कम सीख जायेंगे,

जो न रोकी वक़्त की ऐसी करवट,

मौत की गोदी में सोना सीख जायेंगे,

न बहाओ आखों से आंसू इतने लाचारी के,

के ये आंसू खुद रुकना भूल जायेंगे,

न जोडो हाथ इतने सितमगर के सामने,

के ये हाथ एक दिन उठना भूल जायेंगे,

रोज़ करते है वो बैगैरत मुल्क को नज़रो के सामने,

तो किस तरह हम गैरत से जीना सीख पायेंगे,

न बचा पाए अपनी जो धरती माता की अस्मत,

तो किस तरह अपनी बेटियों की बचा पायेंगे.

–-अंकित पंच

Ankit Panch

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Comments
One Response to “क्या कर पायेंगे”
  1. palakmathur says:

    achhi kavita hai!! Loved it!!

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