क्रांती का कमाल


मातरे हिंद के चेहरे पर जवाल आ जाये,

जो है दिलों में हमारे सबके बवाल आ जाये,

क्या हैं हम, हस्ती है क्या, ये सवाल आ जाये,

जो एक बार वतन में क्रांती का कमाल आ जाये,

गुमसुम हुये चेहरों पर मौसम खुशहाल आ जाये,

सुस्त हुई आंखों में रोशन खुमार आ जाये,

सितमगर लंबे रास्तों में पडाव आ जाये,

गर एक बार वतन में क्रांती का कमाल आ जाये,

धीमी बदलाव हवाओं मे रफ़्तार तूफ़ानी आ जाये,

सरफ़रोषी की छोडी सरायों में मुसाफ़िर आ जाये,

बदलाव लाके रहेंगे, अल्फ़ाज़ हर ज़ुंबा पर आ जाये,

तो एक बार वतन में क्रांती का कमाल आ जाये,

जब सब कहेंगे तो रोशनी क्या खुद खुदा भी आ जाये,

अंधेरे मे जले हुओं को सुबह का इंतज़ार भा जाये,

उस सुबह के बाद मज़ाल है जो दिलों मे मलाल आ जाये,

सब रोशनी में खिलेंगे, न होगा कोई जो रोशनी से बीमार आ जाये,

बस एक बार वतन में क्रांती का कमाल आ जाये,

–-अंकित पंच

Ankit Panch

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Comments
One Response to “क्रांती का कमाल”
  1. palakmathur says:

    अब तो बस आ ही जाये!! बेहतरीन कविता है!

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