हम संपूर्ण हैं।


इस पत्र को प्रारंभ करने से पहले, समस्त भारतवासियों को स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त) की हार्दिक शुभकामनायें ।

भारत एक विशाल राष्ट्र है, यहां अनेकों प्रकार की विविधताओं के आस्तित्व से हम भली भांती परिचित हैं, इसके साथ ही हमनें सरकारी कथनों के अनुसार विविधताओं में एकता के सिधांत को भी अपने बुद्धिजीवी जीवन में पुर्ण रूप से सारग्रहित कर लिया है, तथा साथ ही हमनें आज़ादी के बाद के 62 सालों में (या शायद इसके पहले से) सहनशक्ति को अनेकों नये मानदंडों पर सिध्द भी किया है, जो शायद बुद्धिजीवी वर्ग के लिये एक उपलब्धि भी है। सिर्फ़ यही नहीं हमारे लोगों और सरकारों ने इन 62 सालों में कयी क्रांतीकारी कदम उठाये हैं, तथा नये (पश्चिमी) विचारों को आत्मसात करने की कोशिश भी की है, साथ ही इसके कयी सारे गुण जो हममें विकसित हुए हैं, तथा कुछ जो विकास के मार्ग में जो बाधा हैं, व कुछ सम्भाव्नायें, उनकी समिक्षा कुछ इस प्रकार है।

  • विकास के मार्ग पर चलते हुये दूसरे कि विचारधारा के आगे हमनें इतना झुकना सिखा हैं की उस प्रक्रिया के दौरान हम अपनी स्वयं की आधारित विचारधारा से डांवाडोल हो उठते हैं ( राजनीतिज्ञों, लाल क्रांतिकारीयों, पूंजीवादियों तथा भूरे अंग्रेज़ों को इस क्रम से यथोचित दूरी पर रखा गया हैं)।
  • समय समय पर हम कोशिश करते हैं अनेको परिस्थितियों से पीठ दिखा भागने की, और सफ़ल भी होते हैं, परंतु जन्मजात विशिष्ट धावक के होने के उपरांत भी हम इतने वर्षों में ओलंपिक से सिर्फ़ निशानेबाजीं में ही स्वर्ण पदक लाये हैं, हांलाकि यह भी एक गर्व की बात है (अगर हम यह याद रखें की अब तक हमारी राष्ट्रीय प्रणाली ने सिर्फ़ विलुप्त होते ईमानदार तथा शांतीप्रिय लोगों को ही अपना निशाना बनाया है)।
  • कन्या भ्रूण हत्या से सभी एक समान विचलित हैं, तथा राजनीतिज्ञ इस सामाजिक कुप्रथा को जड से निकाल फ़ैंकने की पूरी कोशिश में हैं, तथा हम सभी यह कामना करते हैं की हर भ्रूण को जन्म का तथा पालन पोषण का अधिकार मिले, साथ ही इसके अगर राजनीतिक भ्रूण हत्याएं भी किसी प्रकार से बंद हों सके तो न जाने कितने नये नेता जन्म ले सकेंगे।
  • जनसंख्या वृद्धि दर को कम करने के लिये हम भारतीय अब वचनबध्द हैं, तथा ज्यादातर इसे कम करने के लिये उचित मानदंडों पर स्वयं को सिध्द कर रहें हैं, जिनमें समलैंगिको के योगदान की, किसानों की आत्महत्याओं की, पुलिस कि गोलियों से होने वाली मौतों के योगदान की उपेक्षा करना गलत होगा।
  • हाल में ही सरकारी सम्पत्ति को आंदोलनों में नुकसान पहुंचाने वालों को यथोचित दंड देने का प्रवधान भी किया गया है, यह एक क्रांतीकारी कदम है जो पहले से ही टूटी फ़ूटी, जर्जर, तथा निम्न ग्रेड निर्माण सामग्री से बनी हुई राष्ट्रीय सम्पत्ति को तथा उसे बनाने वाले सरकारी तंत्र को बचाने के लिये सर्वोत्तम है।
  • पश्चिमी लोग भारत को एक गरीब देश मानते थे, इसे सपेरों का देश कहते थे, तथा इसे हीन द्रुष्टि से निहारा करते थे, परंतु हमारे कुछ राजनेता जो किसी प्रकार के तिरस्कार से व्याकुल थे, उन्होंने संसद में नोटों की गड्डियों को लहरा कर संपुर्ण विश्व को जो पूंजी युक्त संदेश दिया है, उसने उन लोगों को मूक कर दिया है तथा राष्ट्रभक्ति में नये आयाम साबित किये हैं।
  • भारतीय मिडिया जो जनता की आवाज कही जाती है, यह आवाज इतनी बुलंद हो चुकी है, की संसद में जाने वाले मुद्दे, पहले मिडिया से होकर गुजरते हैं, तथा फ़िर मिडिया के विभिन्न समाचार चैनल संसद की कार्यवाहीयों का पूर्ण वैयक्तिक विश्लेषण कर उसे जनता को परोसते हैं, तथा हर चैनल एक अलग ही तरह का प्रभावी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिससे भोली जनता पुर्ण तरह से आत्मसात कर लेती है। गणतांत्रिक देश में ये, गणतांत्रिक सरकार तथा जनता के मध्य की दूरी मापने के लिये टि आर पी, ओपिनियन पोल, एक्ज़िट पोल आदि का उपयोग करते हैं।
  • भारत की बढती जनसंख्या के कारण कम होती जमीन, से निपटने के लिये, विभिन्न सरकारों कार्यालयों ने काफ़ी कदम उठाये हैं, जिनमें भू-माफ़ियाओं, तथा कब्जे यूक्त भूमी की न्यून्तम कीमत निश्चित की जाती रही है, साथ में इन भूमीयों से आने वाले कमिशनों को भूला नही गया है। साथ ही, किसानों से सरकारी निर्माणों, तथा निजी कारखानों के लिये, जो देश के विकास के ध्योत्क हैं, न्यून्तम कीमत पर खेती उपयोगी जमीनें खरीदी जा रहीं हैं। जिसके पश्चात होने वाले, आंदोलनों में, तथा किसानों के आत्महत्याओं से, देश की जनसंख्या कटौती हो रही है। साथ ही इसके, भूमीहीन किसान जो अंत में कारखानों में काम करने लग जाते हैं, वे विदेशी कमप्नियों को सस्ते श्रमिक बन अत्याधिक लाभ पहुंचाते हैं। अंतत: भारतीय अर्थव्यवस्था को क्रुषी प्रधान से, उन्नत कारखानी अर्थवयव्स्था बनाया जा रहा है।
  • मानवाधिकार भारतीय सभ्यता में एक अहम पहलू है, पिछले कुछ वर्षों में मानवाधिकारी संगठनों के उचित समय पर उठाये गये कदमों के कारण, कई विदेशी आतंकियों के मानवाधिकारों का शोषण होने से बचाया गया है। हांलाकि ये संगठन जानते हैं की आम भारतीय नागरिक इतना सक्षम है कि उसे इन संगठनों कि आवश्यकता निम्न है, तथा विदेशीयों में भारत की मानवाधिकार संबंधी छवि को निखारने में इनका योगदान प्रचलित है।

अंत में इन सभी प्रयासों से उचित सार ग्रहण करने पर इस मंतव्य पर पहुंचते हैं, कि हमें सिर्फ़ द्रुष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। हम संपूर्ण हैं।

Advertisements
Comments
One Response to “हम संपूर्ण हैं।”
  1. Hemant sharma says:

    I think there is a boundary in front of the youth which is stopping them from coming in front. One of the cause may be the long election procedure of our country.
    Yet we should be glad that we have the largest democracy.
    As one learn from his mistakes and Our country is also among them whose youth and the youth present nature is changing, we definitely gonna make a country of what our freedom fighters thought

    And I have no words for my brother Ankit Panch

    rest i think he should continue doing his work …….

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: