खुला पत्र:हुसैन व हिंदु


इस वख्त मैं यहां किसी को अपने कर्म से विमुख करने की चेष्टा नहीं रखता हूं, नहीं किसी को कोई पाठ पढाने की कोशिश कर रहा हूं, मैं वही कह रहा हूं जो अब तक समय कहता आया है। नियती के अनुसार सब कर्म करते हैं, कर्म अच्छे या बुरे नहीं होते, अगर वो सिर्फ़ कर्म हैं। कर्मफ़ल व्यक्तिगत लाभ या हानी के अनुरुप, अच्छा या बुरा प्रतीत होता है, जिसकी चेष्ठा उस कर्म को कर्म नहीं रहने देती, वह उस कर्म को विफ़ल कर देती है। आगे सब अपनी नियति के अनुसार बुध्दि विचार करते हैं, और जो सनातन है, उस तक विचार नहीं पहुंच सकते। विचार विमर्श परिस्थितीयों का हो तो सकता है, पर जो नियती द्वारा निर्धारित है, उस पर विचार विमर्श करने का फ़ायदा भी नहीं है, क्योंकि विचार विमर्श जिस निर्णय पर पहुंचते हैं, वो या तो सत्य हो सकता है या नहीं, और वो अगर सत्य है, तो विचार विमर्श से पहले भी सत्य था, और बाद में भी, और जो वो अगर सत्य नहीं है, तो कितने भी विमर्श या निर्णय बाद वो सत्य नहीं हो सकता। आंतरिक मन मैं जो विचार विमर्श चलता है, वही करने योग्य है, और उसका निर्णय नियती के हाथ होता है, और नियति परमेश्वर के निर्णय पर आधारित है। परमेश्वर के आगे समर्पण करने के बाद ही सत्य का मार्ग प्रदर्शित होता है, और सत्य के मार्ग पर कर्म ही प्रधान हैं।

आदि समय से अपने भावों विचारों व संवेदनाओं को अपने वश में करने की बात कही गयी है, क्योंकी संवेदना कर्म के आडे आती है, क्योंकी संवेदना की बाढ में लिये गये निर्णय संवेदनाओं की तरह ही चंचल और न्यूनतम बु्ध्दि से पैदा होते हैं, और व्यक्तिगत व सामाजिक हानि पहुंचाते हैं,परंतु उत्तम विवेक संवेदनाओं के परे से पैदा होता है, और वही सर्वोत्तम मार्ग प्रदर्शित करता है। हुसेन द्वारा चित्रित चित्रों की न ही मैं अलोचना करूंगा, और ना ही कोई टिप्पणी क्योंकी, हुसेन से बडी समस्यायें हमारे समाज मैं व्याप्त हैं। क्या कर पाये हम ? कुछ नहीं। हुसेन के नाम पर हो हल्ला मचाकर हम समझ रहैं की हम अपने बिखरे समाज को जोड रहै हैं, परंतु हो इसका विपरीत रहा है, हुसैन को धर्म के नाम पर बलि दे भी दें पर यह हम भी जानते हैं की वो बलि कोई बडा परिणाम नहीं लायेगी। और क्योंकी हम कुछ नहीं कर पाये, तो संवेदनाशील हो कर क्या कर लेंगे ? संवेदनाओं के सागर मैं स्वयं को डुबा कर खुद को भयभीत कर, हम सिर्फ़ आत्महत्या कर रहे हैं, और इस समय समाज को हमारी अति आवश्यकता है, संवेदनाओं की नहीं। भय हमारा शत्रु है, किसी को तालिबान का भय कि्सी को हुसैन का, किसी को म्रुत्यु का, जिस दिन भय जायेगा उस दिन ही विजय होगी, भय जाता है परस्पर विश्वास, सत्य कर्म व स्वयं शक्ति में आस्था से, इस संवेदना को निकाल फ़ैंकना ही उचित है। और चुंकि हम कुछ नहीं कर पा रहे, तो संवेदनाओं को दूर हटा कर कुछ करना बेहतर होगा। हम संवेदनशील हो भी किस के लिये रहै हैं, उन अलौकिक शक्तियों के लिये, जो इस संसार से परे हैं? उन शक्तियों को उनकी इच्छा के प्रति आपका समर्पण चाहिये, और वो शक्तियां स्वयं मानव कल्याण चाहती हैं। कोई भी हु्सैन उनको नुकसान नहीं पहुंचा सकता, पर अगर उसने हमें मानसिक नुकसान पहुंचाया है, तो हाथ पर हाथ धरे बैठना उचित नहीं होगा, पर हमारे कर्म उच्चतम विवेक पर आधारित होने चाहिये, पहले उसे अपने किये कार्य का बोध कराना आवश्यक है। किसी भी प्रकार विचार विमर्श हिंसक या अहिंसक कार्य बेकार हैं, जब तक हुसैन को अपने द्वारा किये गये कार्य का बोध न हो, और बोध होने के पश्चात किसी प्रकार के दंड की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति खुद प्रायश्चित की अग्नि में दहकता रहता है। अब बात आती है की अगर हमारे कार्यों से हुसैन को प्रायश्चित का भाव न आया तो ? यही तो कर्मफ़ल की आशा है, और यही वर्जित हैं, हुसैन का भाव आना या न आना कुछ भी हो सकता है, पर हमारे सच्चे कर्मों से समाज टूटेगा नहीं परंतु जुडेगा, और यह ज्यादा ज़रुरी है, बाकी और कुछ भी हाथ मैं नहीं, और एकजुट समाज को कभी कोई हुसैन परेशान नहीं कर सकता, बिखरना या जुडना हमारे हाथ में है, बस अब यही देखना है, की हम कहां पहुंचते हैं। आज के हिंदु समाज में हम किसी से प्रेम नहीं करते, बस अपने अहम से करते है, और खुद को हिंदु कहते हैं। परंतु मेरी मतिनुसार जो शायद आपके विवेकानुसार गलत है, कि जहां अहम मरता है, वहां प्रेम बढता है, तथा जो सबसे प्रेम करता है, वह हिंदु होता है। कौन हिंदु है, इसका फ़ैसला आपके विवेक पर छोडते हुए, आगे बढते हैं।

सबसे पहले जानें की हम कैसे हिंदु हैं , उदाहरणतया जिस प्रकार पंडित के घर जन्म लेने से व्यक्ति तब तक पंडित पूर्ण नहीं हो सकता जब तक वह अपने कर्मों से पंडित न हुआ हो, जो कर्मों से पंडित है उसे भी क्ष्रेष्ट कहा गया है, और जो जन्म व कर्म दोनों से जो पंडित है, वो श्रेष्ठ्तम है. उसी तरह जन्म व कर्म से श्रेष्ठ्तम हिंदु ही हिंदु है, और हिंदु होना मतलब मनसा वाचा व कर्मणा से श्रेष्ठ्तम होना है जो की एक श्रेष्ठ्तम मानव होना है। अगर सिर्फ़ जन्म से हिंदु होने से हिंदु होने का अगर गर्व है, तो हिंदु होने के कर्तव्य को भी पहचानें, जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र की उपलब्धियों व गलतियों पर गर्वित व उदास तो होता है, परंतु उसका गर्व या उदासी उसे पित्रत्व भूलने नहीं देती, उसके लिये पित्रत्व कर्म है, संवेदनायें तो आती जाती रहेंगी, अपने कर्म की सीमा इतनी विस्तार हो, की उसे कोई भ्रमित न कर सके, तथा संवेदनायें इतनी प्रबल हों, की जब तक दबी रहैं तब तक ठीक और जो उठ जायें तो व्यक्ति को महापुरुष बना दें। उसी तरह आवश्यकता है एक समान मानसिकता की, जो के दंड देने से पहले, प्रायश्चित का आभाव न होने दे। इस कार्य में शक्ति की आवश्यकता अधिक है, हिंसा में नहीं और एक हिंदु जन्म से ही शक्तिशाली होता है, और जो शक्तिशाली नहीं वो हिंदु नहीं।

( कर्म की बात पर जोर इसीलिये दिया जाता रहा है, क्योंकी कर्म सामाजिक व वैश्विक लाभ के लिये क्रियान्वित होता है न की व्यक्तिगत लाभ के लिये, व व्यक्तिगत रूप से किये गये कर्म फ़ल के लिये स्वयं कर्ता ही ज़िम्मेदार होता है, कोई दूसरा नहीं, और न ही कोई दूसरा किसी और के किये गये कर्म के लिये दोषी या श्रेय का अधिकारी है। करम परधान बिस्ब रचि राखा, जो जस करहु सो तसु फ़ल चाखा मुझे जो कहना था वह मैं कह चुका, जय हिंद।)

प्रार्थी-
अंकित पंच।

शास्तेति केचित् कतिचित् कुमार: स्वामीति मातेति पितेति भक्त्या यं प्रार्थयन्ते जगदीशितारं स एक एव प्रभुरद्वितीय:॥
जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोधिकम् इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् ॥
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृध: कस्यस्विद्धनम् ॥
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥
ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥
समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सहचित्तमेषाम् समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।

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